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Hindi Keyboard Inventor: पटना में पहला हिंदी कीबोर्ड वाला टाइपराइटर आज भी श्रीकृष्ण साइंस सेंटर में प्रदर्शित है. इसका डिजाइन पटना साइंस कॉलेज के प्रोफेसर कृपानाथ मिश्र ने तैयार किया था, जिनका संबंध पटना से है.
पटना. आज कंप्यूटर और स्मार्टफोन पर हिंदी में टाइप करना बेहद आसान है. देवनागरी के अक्षर की-बोर्ड पर आसानी से उपलब्ध हैं और कुछ ही सेकेंड में पूरा पन्ना तैयार हो जाता है. बोलकर भी लोग बेहद आसानी से टाइप कर लेते हैं. लेकिन एक समय ऐसा भी था, जब सरकारी दफ्तरों में हिंदी में कामकाज बढ़ रहा था और हिंदी में टाइपिंग के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी. उस समय हिंदी टाइपराइटर की जरूरत महसूस हुई. इसी जरूरत को पूरा करने के लिए पटना के एक अंग्रेजी के प्रोफेसर ने हिंदी का कीबोर्ड तैयार किया. इसे पहला हिन्दी टाइपराइटर माना जाता है. पटना में आज भी उस दौर की याद संजोए एक हिंदी टाइपराइटर मौजूद है. यह मशीन गांधी मैदान के पश्चिमी छोर पर स्थित श्रीकृष्ण साइंस सेंटर में प्रदर्शित है.
पटना साइंस कॉलेज से है कनेक्शन
इस मशीन के हिंदी की-बोर्ड के डिजाइन का संबंध पटना साइंस कॉलेज के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर कृपानाथ मिश्रा से है. हिंदी टाइपराइटर के लिए तैयार किए गए उनके की-बोर्ड को बाद में जर्मनी की टाइपराइटर कंपनी ने अपनाया और इसका इस्तेमाल हिंदी भाषी क्षेत्रों में होने लगा. देवनागरी में अक्षरों के साथ मात्राओं और दूसरे चिह्नों को भी इस तरह व्यवस्थित किया गया ताकि टाइपिस्ट आसानी से और तेजी से टाइप कर सकें. कई वर्षों के अध्ययन और प्रयोग के बाद पहला हिंदी कीबोर्ड तैयार हुआ. उनके इस डिजाइन को आगे चलकर मिश्रा की-बोर्ड के नाम से जाना गया.
अंगुलियों की पहुंच के हिसाब से लगाए गए थे अक्षर
कृपानाथ मिश्रा के तैयार किए गए की-बोर्ड की सबसे बड़ी खासियत अक्षरों की सजावट था. उन्होंने अक्षरों को इस तरह व्यवस्थित किया कि टाइपिस्ट को बार-बार अंगुलियां दूर तक न ले जानी पड़ें. हिंदी में जिन अक्षरों का इस्तेमाल सरकारी कार्यालयों और समाचार पत्रों में ज्यादा होता था, उन्हें ऐसी जगह रखा गया जहां अंगुलियों की पहुंच आसानी से हो सके. वहीं कम इस्तेमाल होने वाले अक्षरों को ऊपर और नीचे की पंक्तियों में जगह दी गई. इससे टाइपिस्ट कम ट्रेनिंग के बाद भी अच्छी स्पीड से हिंदी टाइपिंग कर सकते थे. इससे कागज की करीब 20 फीसदी बचत होती थी.
जर्मनी की कंपनी ने अपनाया था डिजाइन
प्रोफेसर कृपानाथ मिश्रा के बनाए हिंदी की-बोर्ड के साथ टाइपराइटर तैयार करने का काम आगे जर्मनी की कंपनी ने किया. श्रीकृष्ण विज्ञान केंद्र के पूर्व शिक्षा अधिकारी सतीश रंजन ने बताया कि प्रोफेसर कृपानाथ मिश्र के परिवार की ओर से उनकी मशीन और उससे संबंधित जानकारी श्रीकृष्ण विज्ञान केंद्र को सौंपे गए थे. परिवार के सदस्य उनके दामाद, पुत्र-पुत्री और अन्य परिजन सेंटर पहुंचे थे और मशीन से संबंधित सामग्री तत्कालीन प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर को दी थी. सतीश रंजन बताते हैं कि प्रोफेसर मिश्रा के परिवार की ओर से दी गई मशीन आज भी वहां प्रदर्शित है. डॉ. श्रीकृष्ण सिंह गैलरी में रखी इस मशीन को विज्ञान केंद्र आने वाले लोग देख सकते हैं.
कौन थे प्रोफेसर कृपानाथ मिश्रा?
प्रोफेसर कृपानाथ मिश्र का जन्म 1905 को भागलपुर के चंपानगर में हुआ था. वे पटना साइंस कॉलेज में अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे. अंग्रेजी के साथ-साथ उन्हें जर्मन भाषा का भी गहरा ज्ञान था. वे यूरोपीय संगीत के भी अच्छे जानकार थे. खास बात यह थी कि उनकी पकड़ केवल अंग्रेजी और जर्मन तक सीमित नहीं थी. वे हिंदी और संस्कृत के भी विद्वान थे. उन्होंने कई पुस्तकें और उपन्यास लिखे. भाषा और साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई महत्वपूर्ण सम्मानों से नवाजा गया. 26 दिसंबर 1971में उन्होंने पटना में अंतिम सांस ली.
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अमित रंजन वर्तमान में News18 में बिहार, झारखंड और दिल्ली से जुड़ी खबरों के समन्वय और संपादन का कार्य देख रहे हैं. खोजी पत्रकारिता उनकी विशेष रुचि का क्षेत्र है. राजनीति, शिक्षा, खेल, क्राईम और मौसम जैसे विषयों …
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