ये शहर फिलिस्तीन से सटा हुआ है. ये इजरायली शहर हमेशा ही तीन भारतीय रेजीमेंटों- जोधपुर लांसर्स, मैसूर लांसर्स और हैदराबाद लांसर्स को याद करता है. हालांकि इसमें 900 से ज्यादा भारतीय सैनिकों को बलिदान भी देना पड़ा था. इनका स्मारक आज भी इजरायल के शहरों में मौजूद है.
तब तुर्की की सेनाओं ने हैफा पर कब्जा कर लिया
तुर्की का मोर्चा बहुत मजबूत था
भालों और तलवारों से लैस भारतीय घुड़सवार सैनिक हैफा में मौजूद तुर्की मोर्चों और माउंट कारमल पर तैनात तुर्की तोपखाने को तहस-नहस करने के लिए हमले पर भेजे गए. तुर्की सेना का वह मोर्चा बहुत मजबूत था, लेकिन भारतीय सैनिकों की घुड़सवार टुकड़ियों, जोधपुर लांसर्स और मैसूर लांसर्स ने वह शौर्य दिखाया, जिसका सशस्त्र सेनाओं के इतिहास में कोई दूसरा उदाहरण नहीं है. खासकर जोधपुर लांसर्स ने अपने सेनापति मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत के नेतृत्व में हैफा मुक्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
मेजर दलपत सिंह शहीद हो गए
तीन मूर्ति भवन के सामने लगी मूर्तियां इसकी यादगार
दिल्ली के बहुत ही कम निवासी यह जानते होंगे कि तीन मूर्ति भवन के सामने सड़क के बीच लगी तीन सैनिकों की मूर्तियां उन्हीं तीन घुड़सवार रेजीमेंटों की प्रतीक हैं, जिन्होंने अपनी जान न्यौछावर करके हैफा शहर को उस्मानी तुर्कों से मुक्त कराया.
इस तरह भारतीय सेना ने जीती जंग
मैसूर लांसर्स के सैनिकों ने खड़ी पहाड़ी पर चढ़ाई करते हुए दुश्मन सेना की बंदूकों और चौकी को कब्ज़े में लेने का जतन किया और दूसरी तरफ जोधपुर लांसर्स ने मुख्य माउंट कार्मल की पोस्ट पर हमला बोला. जोधपुर लांसर्स की टुकड़ियां एक्रे रेलवे लाइन को पार करते हुए बढ़ीं लेकिन मशीन गनों की ज़द में आ गईं.
जोधपर लांसर्स ने शहर के भीतर घुसकर दुश्मनों को हैरान कर दिया. इस दौरान मैसूर लांसर्स गोलीबारी कर कवर देते हुए पीछे आ रहे थे. कुछ ही देर में दुश्मन के छक्के छूट गए. दोनों रेजिमेंटों ने मिलकर 1350 जर्मन और ओटोमन सैनिकों को बंदी बनाया, जिनमें दो जर्मन और 35 ओटोमन अफसर भी शामिल थे. असलहे भी कब्जे में ले लिये गए. भारतीय रेजिमेंटों के 8 जांबाज़ मारे गए. 34 घायल हुए जबकि 60 घोड़े भी मारे गए.

