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बालाघाट के वार्ड नंबर 24 में एक छोटे से घर में रहने वाले 67 साल का बुजुर्ग रहते हैं. उनका नाम सुशील है. वह सालों तक वार्ड नंबर 24 स्थित शराब दुकान में एक ठेला लगाकर नमकीन, पानी पाउच और डिस्पोजल बेचकर अपना जीवन यापन करते थे. लेकिन साल 2022 में सरकार ने अहाते (शराब दुकान में बैठकर पीने की व्यवस्था) बंद करवा दिए, जिसके बाद से उनके काम पर असर पड़ने लगा. ऐसे में दुकान तो तब बंद हुई, जिसका असर उनके जीवन पर पड़ने लगा.
आज कहानी है एक अफसर की दरियादिली की, जिसने एक खुद्दार बुजुर्ग की जिंदगी बदलने में अहम भूमिका निभाई. एक बुजुर्ग कभी शराब दुकान के सामने कभी डिस्पोजल, पानी पाउच और नमकीन बेचता था. लेकिन जब एसपी साहब की नजर बुजुर्ग पर पड़ी तो सम्मान की जिंदगी की मिली. ये कहानी जितनी एक अफसर के संवेदनशीलता की है, उतनी एक बुजुर्ग के स्वाभिमान की भी है. चार बच्चे होने के बावजूद बुजुर्ग अपना और पत्नी का पालन पोषण कर रहा है. लेकिन एक वक्त ऐसा आया था. शराब दुकान के आगे दुकान चलाने वाले बुजुर्ग की दुकान टूटने की कगार पर आई. फिर उसी दुकानदार को एसपी ऑफिस में सार्वजनिक कैंटीन खोलने का मौका मिला और कठिन जिंदगी थोड़ी आसान हो गई.
कभी शराब दुकान के आगे चलती थी दुकान
बालाघाट के वार्ड नंबर 24 में एक छोटे से घर में रहने वाले 67 साल का बुजुर्ग रहते हैं. उनका नाम सुशील है. वह सालों तक वार्ड नंबर 24 स्थित शराब दुकान में एक ठेला लगाकर नमकीन, पानी पाउच और डिस्पोजल बेचकर अपना जीवन यापन करते थे. लेकिन साल 2022 में सरकार ने अहाते (शराब दुकान में बैठकर पीने की व्यवस्था) बंद करवा दिए, जिसके बाद से उनके काम पर असर पड़ने लगा. ऐसे में दुकान तो तब बंद हुई, जिसका असर उनके जीवन पर पड़ने लगा. ऐसे में उन्हें दो बार हार्ट अटैक भी आए. फिर वह शरीर की क्षमता के मुताबिक काम करने लगे. जहां काम मिलता यहां जाने लगे.
फिर भी शुरू की दुकान
सरकार ने आहते तो बंद करवा लिए लेकिन फिर काम की कमी से जूझते सुशील को फिर से वही काम करना पड़ा. घर की जिम्मेदारी, हार्ट अटैक के बाद दवाइयों का मोटा खर्च. हर महीने 15 हजार रुपए खर्च सिर्फ दवाई पर ही होता. यहीं सब कारण थे, जिसने फिर से उसी गली में दुकान लगाने पर मजबूर कर दिया. वहीं, दुकान से घर का राशन और दवाइयां आती थी.
फिर आया ऐसा मोड़ जिसने बदली जिंदगी
दरअसल, जिस शराब दुकान के पास सुशील काका की दुकान थी. उस इलाके में शराब पीकर हुड़दंग करने के मामले अक्सर आया करते थे. ऐसे में इलाके की शांति भंग होती. महिलाओं का घर से निकलना मुश्किल हो जाता था. अभद्र भाषा के इस्तेमाल से माहौल खराब हो चुका था. ऐसे में महिलाओं को बार-बार की शिकायत ने सालों पुरानी दुकान को खाली करवा दिया. ऐसे में अवैध अतिक्रमण की कार्रवाई भी शुरू हुई. ऐसे में इस जद में बुजुर्ग सुशील का ठेला भी आया. दुकान टूटने ही वाली थी कि इतने सुशील काका मौके पर पहुंचे. ऐसे में सुशील काका ने अपनी समस्या एसपी आदित्य मिश्रा को बताई.
अफसर की दरियादिली ने बदली बुजुर्ग की जिंदगी
बालाघाट एसपी आदित्य मिश्रा ने बुजुर्ग को एसपी ऑफिस बुलाया. इसके बाद बुजुर्ग की दुकान एसपी ऑफिस में खुलवाई. अब वह एसपी कार्यालय में अपनी कैंटीन चला रहे है. वह न सिर्फ दूर-दूर आ रहे लोगों को चाय नाश्ता कराते हैं बल्कि सभी अफसर उनकी चाय को काफी पसंद करते हैं. अब करीब दो महीने से यहां पर कैंटीन चला रहे है. उनके बच्चे तो है लेकिन कमाई के लिए दूसरे शहर निकल गए. वहीं, सुशील काका अपनी पत्नी के साथ अपना जीवन बिता रहे है.

