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Hyderabad Charminar Dyers: हैदराबाद के चारमीनार क्षेत्र में स्थित लाड बाज़ार और पत्थर गट्टी में 400 साल पुरानी पारंपरिक कपड़ा रंगाई की कला आज भी कायम है. कुतुब शाही और निज़ाम काल से चली आ रही इस परंपरा को रंगरेज़ अपनी तीसरी-चौथी पीढ़ी के साथ आगे बढ़ा रहे हैं. बिना किसी कंप्यूटर या आधुनिक मशीन के, ये कारीगर केवल आंखों के अंदाज़ से बुनियादी रंगों को मिलाकर हूबहू मनचाहा शेड तैयार कर देते हैं.
Hyderabad: तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद स्थित ऐतिहासिक चारमीनार के साए में आज भी 400 साल पुरानी कपड़ा रंगाई की अनूठी परंपरा पूरी भव्यता के साथ सांस ले रही है. लाड बाज़ार और पत्थर गट्टी की तंग व ऐतिहासिक गलियों से गुजरते ही भट्टियों पर उबलते बड़े-बड़े पतीले और उनसे निकलता रंगीन धुआं राहगीरों और पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर बरबस खींच लेता है. कुतुब शाही और निज़ाम काल से चली आ रही यह पारंपरिक कपड़ा रंगाई आज भी हैदराबाद की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और जीवंत इतिहास का एक बेहद अहम और अटूट हिस्सा बनी हुई है.
पुराने दौर में इन दस्तकारों को, जिन्हें स्थानीय भाषा और इतिहास में ‘रंगरेज़’ कहा जाता है, शाही परिवारों की कीमती पोशाकों, मलमल, महीन सूती कपड़ों और रेशमी दुपट्टों को मनचाहा और खास रंग देने के लिए यहां विशेष रूप से बसाया गया था. आज के आधुनिक और डिजिटल युग में, जब कपड़ा उद्योग पूरी तरह से मशीनीकृत और स्वचालित हो चुका है, चारमीनार के ये रंगरेज़ अपनी तीसरी और चौथी पीढ़ी के पारंपरिक हुनर, अनुभव और कारीगरी के दम पर इस ऐतिहासिक विरासत को पूरी मजबूती के साथ जिंदा रखे हुए हैं.
तांबे के बर्तनों और भट्टियों पर पारंपरिक रंगाई की पूरी प्रक्रिया
इस पारंपरिक रंगाई तकनीक की प्रक्रिया बेहद दिलचस्प और ध्यान खींचने वाली है. सबसे पहले तांबे या एल्युमिनियम के बड़े-बड़े बर्तनों में पानी को भट्टी पर तेज आंच में खौलाया जाता है. उबलते पानी में ग्राहक की पसंद का रंग, नमक और विशेष फिक्सर केमिकल्स मिलाए जाते हैं, जो कपड़े पर रंग को पूरी तरह पक्का करने का काम करते हैं. इसके बाद कपड़े को खौलते हुए रंगीन पानी में डालकर एक लंबे लकड़ी के डंडे से लगातार घुमाया जाता है, ताकि रंग कपड़े के हर एक धागे और हिस्से पर समान रूप से चढ़ सके. अंत में कपड़े को साधारण ठंडे पानी से अच्छी तरह धोकर सुखाया जाता है.
बिना कंप्यूटर या मशीन, केवल आंखों के अंदाज़ से परफेक्ट कलर-मैचिंग
इस प्राचीन कला का सबसे जादुई और अद्भुत पहलू इन रंगरेज़ों की कलर-मैचिंग का बेमिसाल हुनर है. बिना किसी कंप्यूटर, डिजिटल कलर स्पेक्ट्रोमीटर या आधुनिक मशीनों के, ये कारीगर केवल अपनी आंखों के अनुभव और सटीक अंदाज़ से बुनियादी रंगों को मिलाकर ग्राहकों की पसंद का हूबहू वही शेड तैयार कर देते हैं जिसकी मांग की जाती है. त्योहारों, ईद और शादियों के सीजन में यहां सादे कपड़ों पर मनपसंद रंग चढ़वाने या खूबसूरत टाई एंड डाई, बंधेज और लहरिया पैटर्न बनवाने के लिए लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है.
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Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with News18 Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…
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