यह 1957 का साल था. भारत को आजाद हुए 10 साल हो चुके थे. इस वर्ष हुए दूसरे लोकसभा चुनाव कई मायनों में सामान्य ही थे. पंडित जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई में कांग्रेस फिर से बड़ी आसानी से सत्ता में लौट आई थी. लेकिन इसी साल बदलाव की एक छोटी-सी दस्तक भी सुनाई दी थी. भारतीय लोकतंत्र के सर्वोच्च सदन यानी लोकसभा में पहली बार दो मुस्लिम महिलाओं ने प्रवेश किया था. इनमें से एक थीं असम के जोरहाट संसदीय क्षेत्र से बेगम मोफिदा अहमद और दूसरी, भोपाल संसदीय क्षेत्र से मैमूना सुल्तान. अलबत्ता, यह अलग बात है कि इस छोटी सी शुरुआत ने बाद में गति नहीं पकड़ी और इसके बाद हुए 16 आम चुनावों के जरिए केवल 16 मुस्लिम महिलाएं ही लोकसभा में पहुंच सकीं, जबकि उम्मीद इस संख्या में कई गुना बढ़ोतरी की थी.
मोफिदा कोई ऐसी राजनीतिज्ञ नहीं थीं कि उन्हें अचानक से उठाकर चुनाव मैदान में खड़ा कर दिया गया हो. वे 1943 से ही कांग्रेस से सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं. 1930 और 1940 के दशक में पली-बढ़ीं मोफिदा ने उन सामाजिक मान्यताओं को ठुकरा दिया, जो उन्हें बांधना चाहती थीं. उन्होंने पर्दा प्रथा को छोड़ दिया, अपनी स्वतंत्रता पर जोर दिया और इस्लाम को उसके प्रगतिशील एवं उदार स्वरूप में अपनाया. उस दौर में जब महिलाएं, खासकर परंपरागत पृष्ठभूमि से आने वाली प्रायः घरेलू दायरों तक ही सीमित कर दी जाती थीं, मोफिदा अद्भुत आत्मविश्वास के साथ सार्वजनिक जीवन में उतरीं.
इस तरह सार्वजनिक जीवन में एंट्री
सार्वजनिक जीवन में मोफिदा का प्रवेश इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी की जोरहाट इकाई से हुआ, जहां उन्होंने संयुक्त सचिव (1946-49) के रूप में सेवा दी. कांग्रेस में वे लगातार आगे बढ़ती रहीं. अक्टूबर 1951 से जनवरी 1953 तक वे पार्टी के तेजपुर जिला महिला प्रकोष्ठ की सहायक सचिव रहीं. 1953 में कांग्रेस के गोलघाट महिला प्रकोष्ठ की स्थापना के समय से 1956 तक वे इसकी कन्वीनर भी रहीं.
मोफिदा असम के एक प्रमुख मुस्लिम परिवार में पैदा हुई थीं. हालांकि, उनकी औपचारिक शिक्षा केवल छठी कक्षा तक ही हुई थी, लेकिन परिवार ने यह सुनिश्चित किया कि उन्हें पर्याप्त घरेलू शिक्षा मिलती रहे. आगे जाकर वे असमिया पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिखने लगीं. उनकी किताबों में ‘विश्वदीप-बापूजी’ और ‘भरतार-नेहरू’ शामिल हैं. इसके अलावा उन्होंने कहानियों की छह अन्य पुस्तकें भी लिखीं. राष्ट्र सेवा के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता उस समय स्पष्ट दिखाई दी, जब 1962 में चीन के आक्रमण के दौरान उन्होंने अपने आभूषण राष्ट्रीय रक्षा कोष में दान कर दिए थे.
1930 और 1940 के दशक में पली-बढ़ीं मोफिदा ने उन सामाजिक मान्यताओं को ठुकरा दिया, जो उन्हें बांधना चाहती थीं. उन्होंने पर्दा प्रथा को छोड़ दिया, अपनी स्वतंत्रता पर जोर दिया और इस्लाम को उसके प्रगतिशील एवं उदार स्वरूप में अपनाया.
5 साल में संसद में पूछे 650 सवाल
संसद में अपने कार्यकाल के दौरान मोफिदा ने ग्रामीण विकास, महिला सशक्तीकरण और वंचित समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति से जुड़े अहम मुद्दे उठाए. अभिलेखागार की पड़ताल से पता चलता है कि उन्होंने अपने पांच साल के कार्यकाल में 650 प्रश्न उठाए. लेकिन 1962 के लोकसभा चुनाव और फिर 1971 के लोकसभा उपचुनाव में उनकी हार के साथ ही उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया, लेकिन सामाजिक कार्यों में निरंतर जुटी रहीं.
दुर्भाग्य से, मोफिदा अहमद के इतने महत्वपूर्ण योगदानों के बावजूद उनका नाम सार्वजनिक स्मृति से लगभग ओझल हो गया. जोरहाट की चहल-पहल भरी गलियों और चौकों पर, जहां उनका जन्म और पालन-पोषण हुआ था, आज उनकी कोई प्रतिमा या स्मृति-चिह्न खोजना नामुमकिन है.
मैमूना सुल्तान: बेगमों के शहर से एक वाक्पटु सांसद
1957 में ही भोपाल संसदीय क्षेत्र से लोकसभा में प्रवेश करने वालीं मैमूना सुल्तान की कहानी और भी दिलचस्प है. मैमूना उस भोपाल क्षेत्र से वास्ता रखती थीं, जहां सियासत महिलाओं के लिए कोई असामान्य बात नहीं थी. यहां 1819 से लेकर अगले करीब 100 साल तक चार बेगमों (कुदसिया बेगम, सिकंदर बेगम, शाहजहां बेगम और सुल्तान जहां) ने राज किया. ये अपने प्रशासनिक कौशल, दूरदृष्टि और सामाजिक सुधारों के कारण देश-विदेश में प्रसिद्ध हुईं.
इस शहर के कुलीन या शिक्षित मुस्लिम घरानों की महिलाओं में अपने नाम के साथ पिता या पति का नाम लगाने के बजाय ‘सुल्तान’ लगाने की रवायत रही और इसी का पालन मैमूना ने भी किया. उनका जन्म एक शिक्षित परिवार में हुआ था. उनके पिता असगर अंसारी कृषि मंत्रालय में सचिव थे. जाहिर है, शिक्षा और संस्कृति की घुट्टी उन्हें जन्म से ही मिली. उन्होंने प्रतिष्ठित अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में स्नातक की पढ़ाई की. जानी-मानी न्यूज एंकर सलमा सुल्तान उनकी छोटी बहन हैं.
मोफिदा अहमद ने अपने पांच साल के कार्यकाल में 650 प्रश्न उठाए. लेकिन 1962 के लोकसभा चुनाव और फिर 1971 के लोकसभा उपचुनाव में उनकी हार के साथ ही उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया, लेकिन सामाजिक कार्यों में निरंतर जुटी रहीं.
युवा विधाक के तौर पर पहचान
मैमूना सुल्तान का राजनीतिक जीवन ऐतिहासिक उपलब्धियों से भरा रहा. उन्होंने सबसे पहले युवा विधायक के तौर पर अपनी पहचान बनाईं और फिर 1957 में असम की मोफिदा अहमद के साथ ही लोकसभा में चुनी जाने वाली पहली दो मुस्लिम महिलाओं में जगह पाईं. वे लगातार दो कार्यकाल (1957 से 1967) तक लोकसभा में सांसद रहीं. लोकसभा में अपने कार्यकाल के दौरान मैमूना सुल्तान अपनी वाक्पटुता और सधे हुए भाषणों के लिए अलग ही पहचान रखती थीं. कहा जाता है कि भारतीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली महिलाओं में से एक विजयाराजे सिंधिया भी संसदीय बहसों में मैमूना के साथ संवाद करते समय असहज महसूस करती थीं. उनकी यह भाषाई क्षमता उन्हें भारतीय राजनीति में एक अलग मुकाम दिलाने में सफल रही.
भाषा और कूटनीति पर उनकी पकड़ ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का ध्यान खींचा. नेहरू, जो बुद्धिमत्ता और वाक्पटुता की सराहना के लिए जाने जाते थे, ने मैमूना में एक सक्षम वक्ता पाया, जो राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर चर्चाओं को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा सकती थीं. उनके बीच हुए संवादों ने मैमूना को नए अवसर दिए, जिससे वे भारत की कूटनीतिक चर्चाओं को आकार देने और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करने में सक्रिय भूमिका निभा सकीं. देश के तत्कालीन रक्षा मंत्री और राजनयिक वीके कृष्ण मेनन भी मैमूना की अंतरराष्ट्रीय विषयों पर समझ से प्रभावित थे. 1958 में कृष्ण मेनन के नेतृत्व में मैमूना ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को भी संबोधित किया.
मैमूना सुल्तान ने सबसे पहले युवा विधायक के तौर पर अपनी पहचान बनाईं और फिर 1957 में असम की मोफिदा अहमद के साथ ही लोकसभा में चुनी जाने वाली पहली दो मुस्लिम महिलाओं में जगह पाईं.
हार से हताश
1967 के लोकसभा चुनाव में मैमूना सुल्तान को हार का सामना करना पड़ा. इस हार से वे हताश हो गईं. लेकिन जल्द ही इंदिरा गांधी आगे आईं. उन्होंने मैमूना को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के विदेश मामलों के विभाग का प्रमुख नियुक्त किया. इस महत्वपूर्ण पद पर रहते हुए उन्होंने दर्जनभर से अधिक देशों का दौरा किया. 1974 में इंदिरा गांधी ने मैमूना को राज्यसभा में नामित किया. इंदिरा की 1980 में सत्ता में वापसी के बाद उन्हें राज्यसभा में दूसरा कार्यकाल भी दिया गया, जो 1986 तक चला.
1980 के दशक की शुरुआत तक, जबकि वे आयु के मामले मंे अभी पचास के दशक के मध्य में ही थीं, उनकी सेहत बिगड़ने लगी. लंबे समय तक राजनीति और सार्वजनिक जीवन की कड़ी भागदौड़ ने उनके स्वास्थ्य पर असर डाला था. आखिरकार उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने का फैसला किया और इसके साथ ही भारतीय राजनीति के एक युग का समापन हो गया.
(देश की 18 मुस्लिम महिला सांसदों के सियासी सफर और उनकी निजी जिंदगी की कहानियां रशीद किदवई और अंबर कुमार घोष की नवीनतम किताब ‘मिसिंग फ्रॉम द हाउस : मुस्लिम वीमेन इन द लोकसभा’ में पढ़ी जा सकती हैं.)

