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उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना ने भी टीएमसी संकट पर टिप्पणी की है. शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में दल-बदल की राजनीति पर तीखा हमला बोला है. पार्टी ने दावा किया कि बंगाल में ममता बनर्जी की हार के बाद टीएमसी में बगावत बढ़ी और कई सांसद-विधायक पार्टी छोड़कर अलग हो गए. संपादकीय में सायोनी घोष का नाम लेते हुए उन्हें अवसरवादी राजनीति का उदाहरण बताया गया और कहा गया कि आज की राजनीति विचारधारा नहीं, बल्कि निजी फायदे के सौदों तक सिमट गई है. शिवसेना ने ऐसे नेताओं को ‘थाली के बैंगन’ बताते हुए उन पर भरोसा न किए जाने की बात कही.
ममता के बागियों पर ‘सामना’ का तंज, कहा- सत्ता दिखी तो बदल लिया पाला
TMC Crisis: बंगाल में ममता बनर्जी की करारी हार हुई. उसके बाद उनकी टीएमसी भी टूट गई. टीएमसी में बागी गुट बन गया है. टीएमसी के बागी गुट का अब विधानसभा से लेकर लोकसभा और राज्यसभा में कंट्रोल दिख रहा है. बंगाल में टीएमसी की करारी हार के बाद कई सांसदों और विधायकों ने ममता की पार्टी छोड़ दी है. अभी ममता बुरी स्थिति में फंसी हैं. इस बीच, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) की ओर से आज यानी शुक्रवार को दावा किया कि देश की राजनीति अब केवल अपने फायदे के सौदे तक सिमटकर रह गई है.
शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ में कहा गया कि वोटर किसी खास पार्टी के चुनाव चिह्न और विचारधारा के आधार पर वोट देते हैं और उम्मीद करते हैं कि उन्हें सही प्रतिनिधित्व मिलेगा, लेकिन अपना फायदा देखने वाले राजनीतिक अवसरवादी नेता अपने निजी फायदे के लिए तुरंत एक पार्टी से दूसरी पार्टी में कूद जाते हैं. नर्सरी राइम ‘हॉप अलोंग, लिटिल कद्दू’ की तरह, ये अवसरवादी नेता और उनके लीडर कूदते-फांदते दिल्ली पहुंच जाते हैं.
‘सामना’ के संपादकीय में तर्क दिया गया कि जिस तरह अंगूर और आम की कई किस्में विकसित की गई हैं, उसी तरह इन अस्थिर नेताओं की भी नई नस्लें सामने आई हैं; इनमें सबसे आगे ‘सायोनी घोष’ किस्म है. संपादकीय में कहा गया है कि कई लोग सोच रहे हैं कि सायोनी घोष जैसे लोगों से कैसे निपटा जाए? मुखपत्र में कहा गया कि चुनाव प्रचार के दौरान सायोनी घोष ने अपने तीखे और जोशीले भाषणों से अपनी पहचान बनाई. उन्होंने ‘मिनी-ममता’ की छवि बनाई, हर रैली में भाजपा पर जमकर निशाना साधा और ममता बनर्जी को अपनी मां जैसा माना. टीएमसी के सांसदों के बीच दरारें पड़ने लगीं, तो बहुत कम लोगों की उम्मीद थी कि सायोनी का भी नाम उस सूची में होगा.
संपादकीय में आगे कहा गया है कि ममता के खेमे में हालात बदलने के साथ ही सायोनी घोष ने अपनी ‘मातृ-तुल्य’ नेता और तृणमूल कांग्रेस का साथ छोड़ दिया है और भाजपा के खेमे में शामिल हो गई हैं. हालांकि, पार्टी छोड़ने वाले टीएमसी सांसदों ने अभी के लिए एक स्वतंत्र समूह बनाया है, लेकिन वे जल्द ही भाजपा में शामिल हो जाएंगे.
संपादकीय के अनुसार, ‘जब आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने अपनी पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थामा था, तो सायोनी घोष ने उनके इस धोखे पर बहुत नाराजगी जताई थी. उन्होंने आधुनिक राजनीति में वफादारी और नैतिकता के पूरी तरह खत्म होने पर अफसोस जताया था. जब उनसे पूछा गया था कि क्या वह भी कभी भाजपा में शामिल होंगी, तो गुस्से में घोष ने कहा था, ‘मैं घोष हूं, चड्ढा नहीं, जो शॉर्ट्स (निकर) पहनकर पाला बदल ले.’ लेकिन आज, वह खुद वैसी ही बन गई हैं; उन्होंने ईमानदारी का चोला उतार फेंका है और सत्ताधारी पार्टी के इशारों पर नाचने वालों की कतार में शामिल हो गई हैं.
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने कहा कि बेतहाशा महत्वाकांक्षा और धोखेबाजी नेताओं को “थाली में रखे बैंगन” यानी “दलबदलू” बना देती है. ‘सामना’ में कहा गया, ‘यह अब सिर्फ एक मुहावरा नहीं रह गया है; यह आज की भारतीय राजनीति की कड़वी सच्चाई बन गया है. दल-बदलू नेता बैंगन की तरह होता है, जिसे चूल्हे पर पक रही किसी भी डिश में मिलाया जा सकता है, चाहे वह भरता हो या भजिया; उसका अपना कोई खास स्वाद नहीं होता.’
मुखपत्र में कहा गया कि हाल ही में महाराष्ट्र की राजनीति में ऐसे दल-बदलू नेताओं की बाढ़ सी आ गई है और उन्हें खूब बढ़ावा दिया जा रहा है. “सायोनी घोष का मामला एक बेहतरीन केस स्टडी है. ये ‘थाली के बैंगन’ जैसे नेता गिरगिट से भी तेजी से रंग बदलते हैं. यह चलन इतना आम हो गया है कि इस पर पीएचडी रिसर्च भी हो सकती है. मौकापरस्त राजनीति का चलन इतना बढ़ गया है कि हर कोई दल-बदलू बनना चाहता है. यह देश की राजनीति और विचारधारा के गंभीर पतन को दर्शाता है. संपादकीय में कहा गया, ‘आखिरकार ये नेता सस्ती और हर जगह आसानी से मिलने वाली चीजें बन गए हैं. इनमें न तो कोई मजबूती है और न ही कोई खास पहचान; राजनीतिक दबाव पड़ते ही ये नरम पड़ जाते हैं और मुरझा जाते हैं. अब इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता.’
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