(गौरव शर्मा)
आधी रात होने वाली है. मथुरा जाग रही है. मंदिरों में दीप जल रहे हैं, कहीं शंख बज रहा है, कहीं मृदंग की थाप है. गलियों में कान्हा के जन्म की तैयारी है. किसी आंगन में एक मां अपने बच्चे को पीताम्बर पहना रही है, माथे पर मोरपंख सजा रही है. बच्चा बार-बार मुकुट उतार देता है. मां हंसकर कहती है, ‘अरे लाला, मुकुट तो धर ले!’ बच्चा फिर मुकुट उतार देता है और मां भी हंस पड़ती है. ब्रज में कृष्ण शायद ऐसे ही जन्म लेते हैं- पहले किसी बच्चे की हंसी में, फिर किसी मां की आंख में और उसके बाद मंदिर की घंटियों में.
थोड़ी देर में आवाज उठेगी, ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की!’ और ऐसा लगेगा जैसे हजारों साल पुरानी वह रात फिर लौट आई है. मथुरा के कारागार में जन्मा वह बालक, जिसे वसुदेव यमुना पार लेकर गए थे, आज भी हर जन्माष्टमी पर ब्रज के घर-घर में जन्म लेता है. लेकिन कृष्ण की कथा केवल उनके जन्म की कथा नहीं है. असली कथा तो उसके बाद शुरू होती है- एक ऐसी यात्रा, जिसमें कृष्ण एक नगर से दूसरे नगर, एक भाषा से दूसरी भाषा और एक हृदय से दूसरे हृदय तक जाते रहे.
मथुरा से गोकुल, गोकुल से वृंदावन और वृंदावन से द्वारका तक कृष्ण की लीला का भूगोल फैलता गया, लेकिन ब्रज ने उन्हें कभी दूर नहीं जाने दिया. यहां कृष्ण भगवान से पहले कन्हैया हैं, श्याम हैं, नंदलाल हैं, लाला हैं. उनसे बात होती है, शिकायत होती है, रूठना होता है, मनाना होता है. ब्रज में भक्ति में जितना दर्शन है, उतना ही अपनापन भी है. यहां कोई बड़े-बड़े शब्दों में नहीं कहता कि ईश्वर और जीव का संबंध क्या है. कोई बस इतना कह देता है- ‘कान्हा तो ब्रज के हिय में बसैं.’
और फिर सूरदास की आवाज सुनाई देती है- ‘मैया मोरी, मैं नहिं माखन खायो.’ माखन की मटकी खाली है, गोपियां शिकायत लेकर खड़ी हैं और कृष्ण अपने चेहरे पर ऐसी मासूमियत लाए हैं कि मैया भी क्या करे. कृष्ण की यही बाल-छवि भक्ति को घर के भीतर ले आती है. भगवान मंदिर में विराजमान रहने वाले दूर के देवता नहीं रह जाते; वे आंगन में खेलने वाला बच्चा बन जाते हैं. उन्हें जगाया जाता है, नहलाया जाता है, सजाया जाता है, भोग लगाया जाता है और फिर सुलाया जाता है. वल्लभाचार्य की पुष्टिमार्गीय परंपरा में ठाकुरजी की सेवा का यह भाव कृष्ण को उपासना से उठाकर परिवार के सदस्य की तरह हमारे बीच बैठा देता है.
ब्रज में प्रेम का अपना व्याकरण है. यहां तर्क से ज्यादा रस चलता है. कोई पूछे कि कृष्ण में ऐसा क्या है कि सदियां बीत गईं और लोग अब भी उन्हें पुकारते हैं, तो ब्रज का कोई रसिया शायद कहे- ‘कान्हा में बात ही ऐसी है.’ यही बात सूर के पदों में है, यही रसखान की आंखों में है. रसखान ने ब्रज की धूल में वह अपनापन देखा जिसे बड़े-बड़े राजमहलों में भी नहीं पाया. कृष्ण अब केवल ग्रंथों में नहीं थे. वे बोली में उतर चुके थे, गीत में आ चुके थे, रास में आ चुके थे, यमुना के किनारे आ चुके थे और उस धूल में बस चुके थे जिसे ब्रजवासी आज भी माथे से लगाने में संकोच नहीं करते.
कृष्ण की यह यात्रा ब्रज पर रुकती नहीं है. दक्षिण की ओर बढ़िए तो उडुपी आता है. माधवाचार्य ने द्वैत वेदांत के दार्शनिक आधार पर विष्णु-कृष्ण भक्ति को एक सुदृढ़ भूमि दी और उडुपी कृष्ण-भक्ति की एक महत्वपूर्ण धुरी बना. उडुपी के कृष्ण की कथा भी अपने भीतर लोकविश्वास और भक्ति का सुंदर संसार रखती है.
और फिर आती है कनकदास की कथा- एक भक्त, जिसे मंदिर के भीतर प्रवेश नहीं मिला. वह बाहर खड़ा रहा, कृष्ण को पुकारता रहा. कथा कहती है कि भगवान की मूर्ति ही भक्त की ओर मुड़ गई. आज उडुपी में जिस खिड़की से कृष्ण के दर्शन किए जाते हैं, वह कनकदास की इसी स्मृति से जुड़ी है.
इतिहास अपने दस्तावेजों से इस कथा को जिस तरह देखे, लेकिन भक्ति इसे अपने ढंग से याद रखती है. एक भक्त बाहर खड़ा था और कृष्ण भीतर थे. फिर प्रेम ने दूरी मिटा दी. ब्रज में कोई यह कथा सुने तो शायद कहे- ‘देख्यो! प्रेम में बड़ी ताकत होय है.’ यही कृष्ण-भक्ति का सहज सत्य है- भक्त भगवान तक पहुंचने की राह खोजता है, लेकिन कभी-कभी कथा में भगवान स्वयं भक्त की ओर मुड़ आते हैं.
फिर यह यात्रा बंगाल पहुंचती है. नवद्वीप का निमाई- शास्त्रों का विलक्षण विद्वान, तर्क में प्रखर, लेकिन एक दिन कृष्ण-प्रेम में ऐसा डूबा कि विद्वत्ता के ऊपर भक्ति उतर आई. यही निमाई आगे चलकर चैतन्य महाप्रभु कहलाए. उन्होंने कृष्ण को केवल मंदिर की चौखट के भीतर नहीं रखा. मृदंग उठा, करताल बजे, लोग गलियों में निकले और कृष्ण का नाम सामूहिक स्वर बन गया- ‘हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे.’
चैतन्य के संकीर्तन में भक्ति अकेले मन की साधना नहीं रही. वह सामूहिक अनुभव बन गई. लोग साथ गाने लगे, साथ चलने लगे, साथ नाचने लगे. एक विद्वान संन्यासी की आंखों से आंसू बहते और कंठ से कृष्ण का नाम निकलता. भक्ति में ज्ञान था, लेकिन ज्ञान पर प्रेम भारी था. ब्रज की भाषा में कहें तो- ‘कान्हा को पुकारो तो आवाज अकेली कहां रहत है!’
यही भारत की भक्ति की बड़ी विशेषता है. कृष्ण हर जगह गए, लेकिन हर जगह वैसे ही नहीं रहे. किसी ने उन्हें गोपाल कहा, किसी ने गोविंद, किसी ने गिरधर, किसी ने मुरलीधर. कहीं बालकृष्ण हैं, कहीं रासबिहारी, कहीं सारथी, कहीं नीति के कृष्ण. नाम बदलते रहे, भाषा बदलती रही, पूजा की विधि बदलती रही, लेकिन कृष्ण से मनुष्य का रिश्ता बना रहा.
फिर सदियां बीतीं और एक दिन कृष्ण की यह यात्रा समुद्र पार चली गई.
वर्ष 1965. 69 वर्षीय ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद भारत से अमेरिका के लिए जलदूत नामक जहाज पर सवार होते हैं. उम्र अधिक थी, साधन सीमित थे और आगे का रास्ता अनिश्चित. लेकिन मन में एक विश्वास था-कृष्ण का संदेश पश्चिम तक पहुंचाना है. लगभग 35 दिनों की समुद्री यात्रा, स्वास्थ्य की कठिनाइयों और अनजान दुनिया के बीच वे अमेरिका पहुंचे. बोस्टन से न्यूयॉर्क की ओर बढ़ते हुए उनके सामने वह दुनिया थी, जो ब्रज की गलियों से हजारों किलोमीटर दूर थी.
जरा उस दृश्य को फिर से देखिए.
एक वृद्ध भारतीय संन्यासी. एक विशाल विदेशी शहर. न कोई राजमहल, न कोई बड़ा मंच. साथ में ग्रंथ और कृष्ण का नाम. और फिर न्यूयॉर्क के टॉमपकिंस स्क्वायर पार्क में मृदंग और करताल की ध्वनि सुनाई देती है. वही संकीर्तन, जिसकी गूंज कभी नवद्वीप की गलियों में उठी थी, अब अटलांटिक पार सुनाई दे रही थी. 1966 में प्रभुपाद ने न्यूयॉर्क में इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्ण कॉन्शियसनेस की स्थापना की और धीरे-धीरे कृष्ण-नाम दुनिया के अनेक हिस्सों तक पहुंच गया.
सोचिए, ब्रज की एक पुकार कितनी दूर चली गई.
‘कान्हा!’
‘श्याम!’
‘गोविंद!’
और फिर-
‘हरे कृष्ण’
यह केवल कृष्ण की यात्रा नहीं थी. यह भारत की उस सांस्कृतिक शक्ति की यात्रा भी थी, जो अपने मूल भाव को बचाए रखते हुए भाषा और भूगोल बदल सकती है. माधवाचार्य ने कृष्ण को दर्शन की भाषा दी. वल्लभाचार्य ने सेवा की. सूरदास ने मातृत्व की. रसखान ने प्रेम की. चैतन्य ने संकीर्तन की. और प्रभुपाद ने उसी कृष्ण-नाम को आधुनिक दुनिया की सड़कों तक पहुंचा दिया. लेकिन कृष्ण की सबसे लंबी यात्रा शायद बाहर नहीं, भीतर हुई.
वह यात्रा आज भी जारी है.
जन्माष्टमी की रात जब कोई घंटी बजती है, कोई बच्चा कान्हा बनता है, कोई मां उसे पीताम्बर पहनाती है, कोई साधु भजन गाता है और कोई बूढ़ी दादी कृष्ण की बाल-लीला सुनाती है, तब हजारों साल पुरानी कथा फिर से वर्तमान हो जाती है. कृष्ण किसी पुरानी किताब में बंद पात्र नहीं रह जाते. वे बातचीत में लौट आते हैं.
अर्जुन ने उनसे बात की थी.
गोपियों ने उनसे बात की थी.
उद्धव ने उनसे बात की थी.
संतों ने उनसे बात की.
कवियों ने उनसे बात की.
और आज का मनुष्य भी कर सकता है.
शायद आज की जन्माष्टमी पर हमें कृष्ण से यही पूछना चाहिए- ‘कान्हा, इतने शोर में मन की आवाज कैसे सुनें?’ क्योंकि आज मनुष्य के पास सूचना बहुत है, लेकिन शांति कम; साधन बहुत हैं, लेकिन ठहराव कम; दुनिया से जुड़ने के रास्ते बहुत हैं, लेकिन अपने भीतर पहुंचने का रास्ता उतना साफ नहीं.
कृष्ण का उत्तर शायद गीता से आएगा- कर्म करो. वृंदावन से आएगा- प्रेम करो. द्वारका से आएगा- नीति निभाओ. चैतन्य से आएगा- नाम में डूबो. और ब्रज से शायद कोई धीमी आवाज आएगी- ‘बस, मन सच्चो राखो.’
रात और गहरी हो रही है.
मथुरा में जन्मोत्सव अपने चरम पर है. मंदिरों में घंटियां बज रही हैं. बाहर भीड़ है. भीतर दीप हैं. ब्रज की किसी गली में एक बच्चा अब भी कान्हा बना घूम रहा है. उसका मुकुट थोड़ा टेढ़ा है, बांसुरी हाथ से बार-बार गिर रही है.
कोई उसे देखकर पूछता है-
‘कहां जात हो लाला?’
बच्चा शायद जवाब न दे. बस मुस्कुरा दे.
और उस मुस्कान में कृष्ण की पूरी यात्रा फिर दिखाई दे जाती है.
मथुरा से गोकुल.
गोकुल से वृंदावन.
वृंदावन से द्वारका.
कुरुक्षेत्र में सारथी.
उडुपी में बालकृष्ण.
नवद्वीप में संकीर्तन.
सूर के पदों में श्याम.
रसखान की आंखों में ब्रज.
और न्यूयॉर्क की सड़क पर-
‘हरे कृष्ण.’
इसलिए शायद जन्माष्टमी केवल कृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है. यह उस प्रेम की स्मृति है जो समय से बड़ा है, भाषा से बड़ा है और भूगोल से भी बड़ा है.
ब्रज की बोली में कहें तो…
‘कान्हा एक ठौर के नायं, सबके हैं.’
किसी के लाला.
किसी के श्याम.
किसी के गोपाल.
किसी के गोविंद.
किसी की लोरी.
किसी का भजन.
किसी की आंख का आंसू.
किसी बच्चे की हंसी.
और किसी अनजान शहर में पहली बार सुना गया एक मधुर नाम.
जन्माष्टमी की आधी रात को जब फिर आवाज उठेगी- ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की…’ तो उसमें केवल एक बालक के जन्म की खुशी नहीं होगी. उसमें मथुरा की रात होगी, यमुना की लहर होगी, वृंदावन की धूल होगी, संतों की साधना होगी, कवियों का प्रेम होगा, भक्तों की पुकार होगी और सदियों की वह यात्रा होगी जिसने कृष्ण को एक जगह का देवता नहीं रहने दिया.
वे मथुरा में जन्मे थे. लेकिन हर बार जब कोई उन्हें प्रेम से पुकारता है, वे वहीं फिर जन्म लेते हैं. शायद यही कृष्ण की सबसे बड़ी लीला है. वे एक जगह जन्म लेते हैं, लेकिन हर हृदय में जन्म लेते रहते हैं.
लेखक भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय में मीडिया एवं संचार अधिकारी हैं तथा वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय, कोटा (राजस्थान) में पत्रकारिता एवं जनसंचार विषय में पीएचडी के शोधार्थी हैं.

