कुछ नेताओं को सत्ता विरासत में मिलती है, कुछ उसका इंतजार करते हैं तो कतिपय ऐसे होते हैं जो सत्ता तक पहुंचने की पूरी मशीनरी स्वयं खड़ी करते हैं. डीके शिवकुमार निस्संदेह तीसरी श्रेणी के नेता हैं. कर्नाटक की राजनीति में, जहां हर सियासी कदम को जाति, गठबंधन, वफादारी, धनबल और बाहुबल की तराजू पर तौला जाता है, वहां ‘कनकपुरदा बंडे’ यानी ‘कनकपुरा की चट्टान’ कहे जाने वाले शिवकुमार ने बीते चार दशकों में खुद को एक ऐसे नेता के तौर पर तब्दील कर लिया है, जिसके बिना राजनीति की कल्पना करना भी मुश्किल है.
अब जबकि कर्नाटक में मुख्यमंत्री के पद से सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद उनके उत्तराधिकारी के रूप में डीके शिवकुमार के नाम का एलान बस औपचारिकता मात्र है, कांग्रेस के सामने सबसे अहम सवाल यही है कि क्या प्रदेश की सियासत उनके राजनीतिक मॉडल के लिए तैयार है? यह ऐसा मॉडल है, जो धैर्य रखना जानता है, लेन-देन की व्यावहारिक राजनीति को समझता है, प्रशासनिक महत्वाकांक्षा से भरा है और सत्ता का इस्तेमाल करने से परहेज भी नहीं करता है.
चट्टान बनने की कहानी
डोड्डालाहल्ली केम्पेगौड़ा शिवकुमार का जन्म 15 मई 1962 को कर्नाटक के वोक्कालिगा बहुल ग्रामीण इलाके के एक किसान परिवार में हुआ था. उनके अपने शब्दों में कहें तो उन्हें विरासत में कुछ नहीं मिला. वे कहते हैं, ‘मैं एक साधारण ग्रामीण पृष्ठभूमि से आता हूं, मुझे किसी ने कुछ नहीं दिया. मैंने सब कुछ कदम-दर-कदम खुद हासिल किया है.’
शिवकुमार की राजनीतिक समझ स्कूल और कॉलेज के चुनावों, हॉस्टल के कमरों, छात्र संघों, छोटी-छोटी सभाओं और बेंगलुरु की युवा राजनीति के रफ-टफ माहौल के बीच मंझकर निखरी. जीआरसी कॉलेज में उन्होंने एनएसयूआई का दामन थामा और कांग्रेस की छात्र व युवा संगठन की राजनीति में तेजी से आगे बढ़ते चले गए. किशोरावस्था तक आते-आते ही उन्होंने यह तय कर लिया था कि राजनीति उनके लिए कोई शौक नहीं बल्कि जिंदगी जीने का एक मकसद है. अपनी उम्र के दूसरे दशक तक पहुंचते-पहुंचते वे ऐसे युवा संगठनकर्ता बन चुके थे, जिसका पुराने और वरिष्ठ नेता इस्तेमाल भी करते थे और जिससे सतर्क भी रहते थे.
राजनीति के मैदान में उनकी पहली बड़ी परीक्षा 1985 में हुई, जब उन्होंने सतानूर विधानसभा क्षेत्र से एच.डी. देवेगौड़ा जैसे दिग्गज नेता के खिलाफ चुनाव लड़ा, लेकिन कड़े मुकाबले में मामूली अंतर से उन्हें हार का सामना करना पड़ा. कई युवा राजनेताओं के लिए इस तरह की हार उनके सियासी सफर का ‘द एंड’ बन जाती है. लेकिन शिवकुमार के लिए यह हार जमीनी समझ बढ़ाने का जरिया बन गई. बकौल शिवकुमार, ‘मैं सतानूर के गांवों में वापस गया, वोट मांगने नहीं, बल्कि लोगों की सुनने.’ चार साल बाद महज 27 साल की उम्र में उन्होंने सतानूर सीट जीत ली. 1994 में जब कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया, तब उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़कर जीत हासिल की. इस अनुभव से उन्हें एक सीधा सबक मिला, ‘अगर जनता का समर्थन आपके साथ हो और आप अपनी जड़ों के प्रति वफादार रहें तो आपको आपकी मंजिल तक जाने से कोई नहीं रोक सकता.’
कांग्रेस ही पहचान
डीके शिवकुमार के लिए कांग्रेस से उनका रिश्ता सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि उनकी पहचान का मूल आधार है. बकौल डीके, ‘जब मैं कहता हूं कि मैं जन्मजात कांग्रेसी हूं तो उसका मतलब यह है कि मेरे डीएनए में ही इस पार्टी की वैल्यूज हैं. मैं ताउम्र एक कांग्रेसी ही बना रहूंगा, क्योंकि मैं इस देश की आत्मा के लिए किसी और मंच से लड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकता.’
इसी वफादारी ने उन्हें सोनिया गांधी और गांधी परिवार के साथ-साथ कांग्रेस हाईकमान के लिए बेहद भरोसेमंद बना दिया. आज के उस राजनीतिक दौर में, जहां दल-बदल आम बात हो गई है, शिवकुमार अलग दिखाई देते हैं. उन्हें हिंदू सांस्कृतिक पहचान, मंदिर परंपराओं और आध्यात्मिक प्रतीकों को खुले तौर पर अपनाने से परहेज नहीं है, लेकिन वे ऐसा कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता, कल्याणकारी सोच और संवैधानिक मूल्यों के भीतर ही रहकर करते हैं.
जाति की राजनीति पर उनका नजरिया संतुलित है. वे कहते हैं, ‘जाति शुरुआत हो सकती है, मंजिल नहीं. मैं गर्व से कहता हूं कि मैं वोक्कालिगा हूं और हमेशा अपने समुदाय के साथ खड़ा रहूंगा. लेकिन मेरी असली जाति कांग्रेस है और मैं इस राज्य के हर नागरिक के प्रति कर्तव्य का निर्वाह करता हूं.’
संकटमोचक की भूमिका में
उक्त खूबियों से भी अधिक शिवकुमार की राष्ट्रीय पहचान उनकी उस राजनीतिक क्षमता पर टिकी है, जिसमें वे संकट के समय पार्टी को एकजुट बनाए रखते हैं. 2002 में जब विलासराव देशमुख की सरकार संकट में थी, तब विधायकों को संभालने की जिम्मेदारी उन्हें ही सौंपी गई थी. 2017 में राज्य सभा के चुनाव के दौरान उन्होंने गुजरात कांग्रेस के विधायकों को बेंगलुरु में ठहराया, ताकि अहमद पटेल की संसद में वापसी सुनिश्चित हो सके. 2018 में जब कर्नाटक विधानसभा में त्रिशंकु जनादेश आया, तब भी कांग्रेस-जनता दल (एस) गठबंधन को बचाने में वे केंद्रीय भूमिका में थे. बाद में भी वे उन तमाम राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस के लिए सहारा बने, जहां पार्टी को संख्या, रणनीति और संसाधनों, तीनों की जरूरत थी.
हालांकि उनका तरीका उतना नाटकीय नहीं है, जितनी नाटकीय उनकी छवि बना दी गई है. वे कहते हैं, ‘राजनीति में भरोसा सबसे बड़ी चीज है. अगर लोग आप पर भरोसा करते हैं तो वे आपके साथ खड़े रहते हैं.’ उनकी शख्सियत में यही मिश्रण यानी व्यक्तिगत विश्वसनीयता, संसाधन जुटाने की क्षमता, राजनीतिक साहस और समझदारी उन्हें ‘मिशन इम्पॉसिबल’ का अगुवा बना देता है.
उनकी यही महारत 2023 में भी दिखाई दी, जब कांग्रेस ने कर्नाटक की 224 में से 135 सीटें जीतकर दशकों की सबसे बड़ी राज्य स्तरीय जीत दर्ज की. सिद्धरमैया ने ‘अहिंदा’ सामाजिक गठबंधन और गारंटी योजनाओं के जरिए कल्याणकारी राजनीति का मजबूत नैरेटिव दिया तो शिवकुमार ने संगठन, संसाधन और चुनावी मशीनरी संभाली. साथ ही अपने पीछे वोक्कालिगा समुदाय के समर्थन को लामबंद किया. इन दोनों नेताओं ने मिलकर कांग्रेस को वह ताकत दी जिससे भाजपा सबसे ज्यादा घबराती रही है: एक ऐसा एकजुट प्रांतीय नेतृत्व, जिसमें दोनों नेताओं की खूबियां भले ही एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थीं, लेकिन थीं एक-दूसरे की पूरक.
सत्ता, विवाद और संघर्ष
शिवकुमार के राजनीतिक सफर का कोई भी गंभीर आकलन उनकी जिंदगी से जुड़े विवादों को नजरअंदाज करके नहीं किया जा सकता. वे भारत के सबसे अमीर राजनेताओं में से एक हैं, जिनकी घोषित संपत्ति करोड़ों रुपए है. उन्हें केंद्रीय जांच एजेंसियों की जांचों, छापों, गिरफ्तारी और ऐसे कई आरोपों का सामना करना पड़ा है, जिनका इस्तेमाल उनके विरोधी उन्हें राजनीति में ‘धनबल’ के प्रतीक के रूप में पेश करने के लिए करते हैं. इसका बचाव करते हुए शिवकुमार दो टूक कहते हैं, ‘मैं एक किसान, एक बिजनेसमैन और एक शिक्षाविद हूं. मेरे पास छिपाने के लिए कुछ भी नहीं है.’ उनकी दलील है कि उद्यमिता और व्यवसाय के जरिए धन कमाना किसी को जनसेवा के लिए अयोग्य नहीं ठहरा सकता.
उनका कॅरियर दिखाता है कि उनमें विपरीत परिस्थितियों और असफलताओं को भी अपने पक्ष में करने की गजब की क्षमता है. जेल जाने से कांग्रेस संगठन पर उनकी पकड़ रत्ती भर भी कम नहीं हुई, बल्कि इससे उनके समर्थकों के बीच उनकी छवि एक ‘त्याग करने वाले नेता’ के रूप में और मजबूत हो गई. साल 2023 में मुख्यमंत्री का शीर्ष पद न मिलने के बावजूद उन्होंने उपमुख्यमंत्री का पद स्वीकार किया और सार्वजनिक रूप से पार्टी अनुशासन का पालन करते रहे. वे कहते हैं, ‘मैं पार्टी की पूजा करने में विश्वास रखता हूं, व्यक्ति पूजा में नहीं.’ इसके साथ ही वे यह जोड़ना नहीं भूलते: ‘समय हर बात का जवाब देगा. धैर्य का फल मिलता जरूर है.’
कांग्रेस के लिए शिवकुमार के मायने
कांग्रेस के लिए शिवकुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाना सिर्फ एक वफादार नेता को इनाम देना भर नहीं है. अलबत्ता, यह राज्य की कमान अपने सबसे ताकतवर और अचूक उस संगठनकर्ता के हाथों में सौंपना है, जिसके पास मजबूत जातिगत जनाधार है, जो धन और मीडिया की ताकत को समझता है, जो विकास की भाषा बोलता है, जो धर्म के सही सियासी इस्तेमाल से वाकिफ है और जो भारतीय राजनीति के बेहद क्रूर तथा उतार-चढ़ाव भरे दौर से बचना भी जानता है.
असल में, कर्नाटक को सिर्फ एक नया मुख्यमंत्री ही नहीं मिलने जा रहा, बल्कि उसे एक ऐसा विशुद्ध ‘राजनीतिक योद्धा’ भी मिलेगा जिसका अपने सियासी साम्राज्य के चप्पे-चप्पे पर पूरी तरह से नियंत्रण हासिल है.

