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America Iran War Affect Jalore Granite Market: अमरीका-ईरान के बीच बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर अब जालोर के ग्रेनाइट उद्योग पर साफ दिखने लगा है. एक्सपोर्ट में 30-40 फीसदी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे कारोबार सुस्त पड़ गया है. एक्सपोर्टर राजेंद्र भूतड़ा के अनुसार विदेशी ऑर्डर घटे हैं और बाजार में अनिश्चितता बढ़ने से उद्योग पर संकट गहराने लगा है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते तनाव, खासकर अमरीका और ईरान के बीच बिगड़ते हालात का असर अब स्थानीय उद्योगों तक साफ दिखाई देने लगा है. राजस्थान के जालोर में स्थित एशिया की सबसे बड़ी ग्रेनाइट मंडी इन परिस्थितियों से बुरी तरह प्रभावित हो रही है. फिनिश ग्रेनाइट के एक्सपोर्ट में 30 से 40 फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई है, जिससे पूरे उद्योग की रफ्तार थम सी गई है और बाजार में सुस्ती छा गई है.
जालोर का ग्रेनाइट अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी खास पहचान रखता है और यहां से बड़ी मात्रा में तैयार ग्रेनाइट विदेशों में भेजा जाता रहा है. लेकिन मौजूदा वैश्विक अनिश्चितता के चलते विदेशी खरीदार सतर्क हो गए हैं. नई डील्स कम हो रही हैं, जबकि पहले से बुक ऑर्डर्स में भी देरी देखी जा रही है. खासकर अमेरिका और मध्य-पूर्व के देशों से मांग कमजोर पड़ने के कारण एक्सपोर्ट लगातार घट रहा है.
अंतरराष्ट्रीय तनाव के चलते व्यापारिक लागत और लॉजिस्टिक्स पर भी असर पड़ा है. कंटेनर की उपलब्धता, समुद्री मार्गों की अनिश्चितता और बढ़ते खर्च ने एक्सपोर्ट को महंगा बना दिया है. इसके साथ ही विदेशी बाजारों में मांग कमजोर होने से तैयार ग्रेनाइट का स्टॉक बढ़ता जा रहा है, जिससे कारोबारियों की पूंजी फंसने लगी है और आर्थिक दबाव बढ़ रहा है.
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उद्योग से जुड़े उद्यमियों का कहना है कि यदि हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहे तो जालोर का ग्रेनाइट उद्योग गंभीर संकट में आ सकता है. उन्होंने सरकार से जीएसटी दरों में कमी और आयातित ग्रेनाइट पर शुल्क बढ़ाने की मांग की है, ताकि स्थानीय उद्योग को राहत मिल सके. उनका मानना है कि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो जालोर की पहचान और इस उद्योग से जुड़े हजारों लोगों की आजीविका पर बड़ा असर पड़ सकता है.
ग्रेनाइट उद्योग में आई इस मंदी का असर केवल बड़े एक्सपोर्टर्स तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े हजारों श्रमिक और छोटे व्यापारी भी प्रभावित हो रहे हैं. जालोर में करीब 1500 ग्रेनाइट इकाइयां संचालित हैं, जिनसे 50 हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिलता है. उत्पादन घटने के कारण कई इकाइयों में काम धीमा पड़ गया है, जिससे रोजगार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं.
दुबई, कतर, ओमान और अन्य गल्फ देशों में जालोर के ग्रेनाइट की अच्छी डिमांड रहती थी, लेकिन वर्तमान हालात में इन बाजारों में भी व्यापार प्रभावित हुआ है. सामान्य दिनों में हर महीने 30 से 40 कंटेनर ग्रेनाइट गल्फ देशों तक भेजे जाते थे, लेकिन अब यह संख्या काफी घट गई है. समुद्री मार्गों में बाधा और बढ़ती ट्रांसपोर्ट लागत ने कारोबारियों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं.

